इस बार का चुनावी समर में पिछड़ी जातियों की गोलबंदी अपना अलग असर दिखाएगी। पिछड़ों को साधने की लड़ाई में सपा ने अपनी पार्टी के गैर यादव पिछड़े नेताओं को आगे कर दिया है। इस कवायद का मकसद मुख्यत: ‘यादव समुदाय की पार्टी’ होने के ठप्पे से छुटकारा पाना है। मिशन 2022 फतेह करने के लिए समाजवादी पार्टी की कोशिश गैर यादव पिछड़ों में पैठ बनाने की है। दो चुनावों के नतीजों से उसे सबक मिल गया कि गैर यादव जातियों में अधिकांश वोट भाजपा में खिसक गया। कांग्रेस व बसपा से सपा का हुआ गठबंधन उसके लिए नुकसानदेह साबित हुआ। लिहाजा, अब कुर्मी, मौर्य, निषाद, कुशवाहा, प्रजापति, सैनी, कश्यप,वर्मा, काछी, सविता समाज व अन्य पिछड़ी जातियों को जोड़ने का विशेष अभियान चलाया जा रहा है।
