शहर की सरकार में नए सेनापति की आमद से परिवर्तन की बयार बहने लगी है। इससे न सिर्फ अनचाही धुंध छंट रही है, बल्कि ''सर्विस बिल्डिंग'' में ''अतिक्रमण'' से भी फिलहाल मुक्ति मिली है। इस ''धुंध''और ''अतिक्रमण'' से पिछले कई सेनापति शुरुआती कार्यकाल में परेशान रहे थे। कुछ को आदत पड़ गई, कुछ हार मानकर चले गए। इंजीनियरिंग में महारत हासिल कर चुके नए सेनापति के अंदाज कुछ अलग हैं। हो भी क्यों न? आखिर ''मोदी जी'' के संसदीय क्षेत्र में तकनीकी सुधार कर वे बड़े-बड़ाें की नजरों में चढ़े हुए हैं। आसानी से डिगने वाले नहीं, न? ही व्यवस्था में ढलने वाले लग रहे हैं। कुछ को आशा है कि सेनापति बने ''''इंजीनियर साहब'''' जल्द ही उनकी उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। सड़क, सफाई का मुद्दा ही ऐसा है, इसमें सामंजस्य न? बना तो उम्मीदें बिखर जाएंगी। आखिर जो कमिटमेंट दूसरों से किए हैं, वे पूरे भी तो करने हैं। न?
