वाराणसी। “कोई व्यक्ति केवल इसलिए इलाज से वंचित न रहे क्योंकि उसके परिवार के पास पैसे नहीं हैं।” इसी सोच के साथ श्री सत्य साई संजीवनी अस्पताल समूह उत्तर प्रदेश में अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की तैयारी कर रहा है। संस्थान के चेयरमैन डॉ. सी. श्रीनिवास ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहा कि अस्पताल का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों तक ऐसी स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना है, जहां इलाज आर्थिक स्थिति पर निर्भर न हो।
उन्होंने बताया कि वाराणसी में प्रस्तावित नए केंद्र में शुरुआती चरण में छोटे बच्चों के हृदय रोगों से संबंधित उपचार को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके साथ ही अन्य मरीजों के लिए भी चिकित्सकीय परामर्श, आवश्यक जांच और दवाएं निःशुल्क उपलब्ध कराने की योजना है।
डॉ. श्रीनिवास ने कहा कि संस्थान का प्रयास केवल अस्पताल बनाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जहां मरीज और उसके परिवार को इलाज के दौरान आर्थिक चिंता का सामना न करना पड़े। उन्होंने बताया कि अस्पताल में पर्ची, जांच, दवा और इलाज के लिए किसी प्रकार की बिलिंग व्यवस्था नहीं होगी।
संस्थान के अनुसार शुरुआती चरण में सभी सेवाएं 24 घंटे उपलब्ध नहीं होंगी, लेकिन धीरे-धीरे जरूरत के अनुसार सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। भविष्य में इमरजेंसी सेवाओं और अन्य आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं को भी शामिल करने की योजना है। चिकित्सकों और अस्पताल स्टाफ के लिए भी आवश्यक व्यवस्थाएं विकसित की जाएंगी।
उन्होंने बताया कि परियोजना के लिए बड़े परिसर की तलाश जारी है और जुलाई तक इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होने की संभावना है। इसके बाद अगस्त में भूमि पूजन कार्यक्रम प्रस्तावित है, हालांकि इसकी तिथि अभी तय नहीं की गई है।
वर्ष 2012 में नई रायपुर से शुरू हुआ श्री सत्य साई संजीवनी अस्पताल समूह पूरी तरह निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं के मॉडल पर कार्य कर रहा है। संस्थान के अनुसार 10 जून 2026 तक देश और विदेश से 3.78 लाख से अधिक मरीज पंजीकृत हो चुके हैं, जबकि 42 हजार से अधिक कार्डियक उपचार किए जा चुके हैं।
संस्थान के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश से आने वाले मरीजों की संख्या सबसे अधिक रही है। अब तक राज्य से 1 लाख से अधिक ओपीडी मरीज और 11 हजार से अधिक कार्डियक सर्जरी मरीज पंजीकृत हुए हैं। नई रायपुर केंद्र में बच्चों के हृदय उपचार के लिए आने वाले मरीजों में बड़ी हिस्सेदारी उत्तर प्रदेश की रहती है।
संस्थान का मानना है कि बड़े जनसंख्या वाले राज्यों में जन्मजात हृदय रोग, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों को देखते हुए इस प्रकार की सेवाओं का विस्तार समाज के व्यापक हित में महत्वपूर्ण हो सकता है।