इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में वकालत कर रहे फर्जी वकीलों के सत्यापन को लेकर यूपी बार काउंसिल से पूछा है कि वह बताएं कि इसका पता लगाने के लिए कौन सी प्रक्रिया अपनाई जा रही है? यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज मिश्र व न्यायमूर्ति जयंत बनर्जी की खंडपीठ ने शक्ति प्रताप सिंह की याचिका पर दिया है। याचिका में कहा गया है कि विपक्षी की वकालत की डिग्री फर्जी है। बार काउंसिल में शिकायत करने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस पर याचिका दाखिल करके इस संबंध में पारित सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया गया है कि जिसमें प्रदेश की बार काउंसिल को ऐसे मामलों का पता लगाकर कार्रवाई करने का निर्देश है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई की तारीख 25 अक्टूबर तय की है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सडक़ चौड़ीकरण में याची की जमीन के अधिग्रहण पर एसडीएम सैदपुर गाजीपुर को पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। कहा है कि उसे 150 वर्ग मीटर जमीन के मुआवजे का भुगतान करें या व्यक्तिगत हलफनामे में स्पष्टीकरण के साथ 18 अक्टूबर को हासिल हों। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि आदेश का पालन करके हलफनामा दाखिल किया जाता है तो व्यक्तिगत रूप से हाजिर नहीं होना होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता व न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की खंडपीठ ने मीरा देवी की याचिका पर दिया है।याचिका पर अधिवक्ता कमलाकांत मिश्र व वरुण मिश्र ने बहस की। इनका कहना है कि एसडीएम सैदपुर ने तीन दिसंबर 2014 को लोकनिर्माण विभाग के अधिशाषी अभियंता को रिपोर्ट भेजी थी कि याची को 150 वर्ग मीटर जमीन का मुआवजा दिया जाय, जिसका पालन नहीं किया गया है। कोर्ट ने सरकार से रिपोर्ट मांगी तो बताया गया कि 28 अगस्त 2009 की रिपोर्ट के अनुसार याची की केवल 15 वर्गमीटर जमीन ही सडक़ में ली गई है। एक अक्टूबर 2021 को भी टीम ने निरीक्षण किया है। तहसीलदार ने तीन अक्टूबर को रिपोर्ट दी है कि 15 वर्गमीटर जमीन ही सडक़ में ली गई है, 150 वर्गमीटर जमीन नहीं ली गई। 28 अगस्त 2009 की एडीएम राजस्व की रिपोर्ट में भी 15 वर्गमीटर जमीन है। याची का कहना है कि रिपोर्ट गुमराह करने वाली है। तहसीलदार ने 17 दिसंबर 2013 को निरीक्षण किया था, जिस पर दो जनवरी 2014 को एसडीएम की रिपोर्ट में 150 वर्गमीटर जमीन का मुआवजा देने की सिफारिश की गई है। इसके बाद दो बार निरीक्षण किया गया।
