पद्मश्री मोहम्मद शाहिद, विवेक सिंह व राहुल सिंह के बाद ललित उपाध्याय बनारस के चौथे हाकी खिलाड़ी हैं, जिन्होंने ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया। अपने चमकदार और ऐतिहासिक प्रदर्शन से 41 वर्ष बाद ओलिंपिक पदक का सूखा खत्म किया। आखिरी बार 1996 अटलांटिका ओलिंपिक राहुल सिंह ने खेला था। मास्को ओलिंपिक (1980) में मोहम्मद शाहिद ने टीम को स्वर्ण पदक दिलाया था। उसके बाद 1984 (लाल एंजिल्स), 1988 (सियोल) व 1996 (अटलांटा) के ओलिंपिक में टीम जरूर खेली, लेकिन झोली पदकों से खाली ही रही। कांस्य पदक के लिए गुरुवार को खेले गए मुकाबले में टीम इंडिया शुरू से ही हावी रही और जर्मनी को 5-4 से शिकस्त दी।
इस शानदार जीत के साथ टीम ने दुनिया को एक बार फिर अपने खेल से दीवाना बना दिया। टीम में बतौर फरवर्ड प्लेयर ललित उपाध्याय ने भी जीत की इबारत लिखने में महती भूमिका निभाई। इस जीत के साथ बनारस और पूर्वांचल के हाकी भी उत्साहित और जश्न मनाते नजर आए। ललित उपाध्याय के शिवपुर स्थित आवास पर बधाई देने वालों का तांता लग गया। पिता सतीश उपाध्याय अपनी खुशी बयां करते हुए कहते हैं कि बाबा विश्वनाथ की कृपा है कि बेटा खाली हाथ नहीं आ रहा है। सबसे बड़ी बात कि ओलिंपिक में हाकी का 41 सालों से चला आ रहा सूखा आखिरकार खत्म हो गया। वहीं टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता भारतीय हॉकी टीम के सदस्य ललित उपाध्याय के आवास भगतपुर थाना शिवपुर स्थित आवास पर पहुंच कर उनके माता-पिता को बधाई देने प्रभारी निरीक्षक शिवपुर भी पहुंचे।
